‘एक देश, एक चुनाव’ प्रस्ताव पर विपक्ष का विरोध
चिदंबरम बोले—संवैधानिक ढांचे का उल्लंघन
नई दिल्ली - बिग बॉस इण्डिया टूडे न्यूज
केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे संविधान के मूल ढांचे के विपरीत बताया है।
पी. चिदंबरम ने कहा कि लोकसभा और प्रत्येक विधानसभा का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है। ऐसे में किसी विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल समय से पहले समाप्त करना अथवा बढ़ाना संवैधानिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने एक साथ चुनाव कराने से जुड़े प्रावधानों को लेकर कहा कि उनका जमीर इस व्यवस्था को स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने भी एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था का विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि इस व्यवस्था से चुनाव आयोग को अत्यधिक अथवा बेलगाम अधिकार मिल सकते हैं, जिसका असर देश की लोकतांत्रिक और चुनावी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
‘एक देश, एक चुनाव’ पर बनी समिति की रिपोर्ट
‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के मुद्दे पर विचार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 2 सितंबर 2023 को उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था। समिति ने विभिन्न हितधारकों और विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी थी।
समिति ने लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनावों को चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की सिफारिश की थी। दिसंबर 2024 में ‘एक देश, एक चुनाव’ से संबंधित दोनों विधेयक लोकसभा में पेश किए गए थे और आगे की जांच के लिए उन्हें संसद की संयुक्त समिति के पास भेजा गया।
पहले भी होते रहे हैं एक साथ चुनाव
भारत में वर्ष 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाते रहे थे। 1957, 1962 और 1967 के आम चुनाव भी इसी व्यवस्था के तहत हुए। हालांकि बाद में कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और लोकसभा के कार्यकाल में बदलाव के कारण चुनावों का चक्र अलग-अलग हो गया।
वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था को दोबारा लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का तर्क है कि इससे चुनावों पर होने वाला खर्च कम होगा, बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से होने वाली प्रशासनिक बाधाएं घटेंगी और चुनावी प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित हो सकेगी।
विपक्ष और कुछ अन्य राजनीतिक दलों का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता तथा संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकता है। इसी मुद्दे को लेकर ‘एक देश, एक चुनाव’ पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस लगातार जारी है।