36 वर्षों बाद कश्मीरी पण्डित अपनी मातृभूमि लौटे
बंद पड़े अपने घरों ,बचपन की यादों से रूबरू हो भावुक हुए
श्रीनगर - बिग बॉस इण्डिया टूडे न्यूज
तीन दशक से अधिक समय बाद अपने बचपन की गलियों, बंद पड़े घरों और पुरानी यादों से रूबरू होते हुए कई विस्थापित कश्मीरी हिंदु अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाए।
अमेरिका और यूरोप समेत दुनिया के विभिन्न देशों से आए कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल इन दिनों कश्मीर घाटी के दौरे पर है। इनमें से कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने 36 वर्षों में पहली बार अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को फिर से छुआ है। यह विस्थापित कश्मीरी हिंदु बीते तीन दिनों के दौरान दक्षिण कश्मीर के अलावा सेंट्रल कश्मीर और उत्तरी कश्मीर के कई इलाकों का दौरा कर चुके हैं।
प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य घाटी की मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करना और यह समझना है कि क्या अब वह समय आ गया है जब विस्थापित कश्मीरी हिंदु अपने पैतृक घरों में सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से लौट सकें। समूह घाटी के विभिन्न इलाकों में जाकर लोगों से बातचीत कर रहा है और जमीनी स्तर पर हालात का अध्ययन कर रहा है।
श्रीनगर में 13 जून से आयोजित होने वाले दो दिवसीय सम्मेलन में भी यह प्रतिनिधिमंडल हिस्सा लेगा। जहां विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की वापसी और पुनर्वास की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा होगी। सम्मेलन में जम्मू श्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी मौजूद रहेंगे।
सम्मेलन के बाद प्रतिनिधिमंडल अपनी टिप्पणियों, सुझावों और चिंताओं को एक विस्तृत रिपोर्ट के रूप में तैयार करेगा, जिसे केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपा जाएगा। यह रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंचाई जाएगी और इसमें समुदाय की वापसी से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों और संभावित समाधानों का उल्लेख होगा।
इस यात्रा में शामिल लोगों के लिए यह केवल एक सर्वेक्षण नहीं, बल्कि भावनाओं से भरी एक व्यक्तिगत यात्रा भी है। दशकों बाद अपने घरों और पड़ोस को देखकर कई लोगों की आंखें नम हो गईं। उन्हें अपने बचपन के दोस्त, त्योहार, साझा खुशियां और वह दौर याद आया जब कश्मीर की विभिन्न समुदायों के बीच गहरा भाईचारा हुआ करता था।
प्रतिनिधिमंडल के कई सदस्यों का मानना है कि घाटी में हालात में सकारात्मक बदलाव आया है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि उनकी स्थायी और सफल वापसी तभी संभव होगी जब कश्मीर की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी उन्हें खुले दिल से स्वीकार करे।
पहले लौटने से डर लगता था, लेकिन इस बार हमें काफी बदलाव महसूस हुआ। हमारी जड़ें यहीं हैं। आज भी यहां के दोस्त और यादें दिल में बसी हैं। जहां हम आज रहते हैं वहां सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन अपनी मातृभूमि से जुड़े रहने का जो सुकून होता है, वह कहीं और नहीं मिलता।
हम चाहते हैं कि एक दिन फिर अपने घरों में लौटें और अपने कश्मीरी भाइयों के साथ उसी भाईचारे के माहौल में रहें, जैसा कभी हुआ करता था।'