संपादकीय
जालन्धर का सैंट्रल टाऊन इलाका
पंजाब की राजनीति व केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र पंजाब की सत्ता का केन्द्र बिन्दू
रमेश महेन्द्रू
मुख्य संपादक
बिग बॉस इण्डिया टूडे
जालन्धर का सैंट्रल टाऊन केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीतिक चेतना और नेतृत्व की वह धरती है, जिसने समय-समय पर प्रदेश को ऐसे जननेता दिए, जिनकी गूंज विधानसभा से लेकर संसद तक सुनाई दी। जालन्धर केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र लंबे समय से पंजाब की राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा है और इस क्षेत्र का इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों, जनसेवा तथा राजनीतिक संघर्षों से समृद्ध रहा है।
इस क्षेत्र का नाम लेते ही सबसे पहले स्वर्गीय मनमोहन कालिया का स्मरण होता है। जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के मजबूत स्तंभ रहे मनमोहन कालिया ने अपनी लोकप्रियता और जनसेवा के बल पर 1967, 1969, 1977 और 1985 (प्रचलित अभिलेखों के अनुसार) में जालन्धर केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे 1967 में कैप्टन गुरनाम सिंह और 1970 में सरदार प्रकाश सिंह बादल के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे।
कालिया जी ने 1964 में पहली बार जालन्धर में नगर पालिका का चुनाव लड़ा और विजयी रहे।
यहीं से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर
जालन्धर में सीवरेज की शुरुआत भी उनके रहते हूई जब वह पंजाब सरकार में स्थानीय निकाय मंत्री थे।
आपातकाल के काले दौर में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और 19 महीने जेल में रहे। यह उनके राजनीतिक साहस और सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण था। दुर्भाग्यवश, 1986 में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके इकलौते पुत्र मनोरंजन कालिया ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और आज भी उनका परिवार जालन्धर की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
इसी प्रकार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यश का नाम भी पंजाब की राजनीति में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे 1952, 1962, 1972 और 1980 में जालन्धर केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए तथा 1992 में जालन्धर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने। उन्होंने 1957, 1959 और 1961 में उप-शिक्षामंत्री तथा 1962 में पंजाब के शिक्षामंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे प्रतिष्ठित समाचार पत्र हिन्दी मिलाप के मुख्य संपादक रहे। उस दौर में उनकी पहचान केवल एक राजनेता तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक विचारक, शिक्षाविद् और समाज को दिशा देने वाले व्यक्तित्व के रूप में भी जाने जाते थे। पंजाब की राजनीति में उनका एक अलग रुतबा और प्रभाव हुआ करता था।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जालन्धर का सैंट्रल टाऊन पंजाब की राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। यहां की गलियों ने ऐसे नेताओं को जन्म दिया, जिन्होंने विचारधाराओं से ऊपर उठकर जनहित को सर्वोपरि रखा। आज जब राजनीति में मूल्यों और जनसंपर्क की चर्चा होती है, तब इस क्षेत्र का इतिहास नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आता है।
सबसे अहम या फिर इसे इत्तफाक कहें कि राजनिति में वह दोनों एक दूसरे का प्रतिबंधी बन कर एक दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते रहे,दोनो ने ही वर्षों तक एक दूसरे से चुनाव हारने व जीतने में गुजार दिये। कुदरत की बात करें तो वह भी पीछे नहीं रही,बेशक उनकी पुण्यतिथि के वर्ष अलग रहे हो ,लेकिन इन दोनों की पुण्यतिथि का दिन भी एक है 2 जून
इन दोनों महानुभावों को शत शत नमन व श्रद्धांजलि
समय बदलता है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन इतिहास अपने निशान छोड़ जाता है। जालन्धर का सैंट्रल टाऊन और केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र आज भी पंजाब की राजनीति की धड़कन है, और आने वाले समय में भी यह प्रदेश के नेतृत्व को नई दिशा देता रहेगा।