जम्मू-कश्मीर के वीडीसी/वीडीजीसदस्यों ने की कल्याणकारी नीति और मानदेय बढ़ाने की मांग
जम्मू/नई दिल्ली - बी बी आई टी डेस्क
जम्मू-कश्मीर में 1990 के दशक में उग्रवाद से निपटने के लिए गठित ग्राम रक्षा समिति (वीडीसी) और अब ग्राम रक्षा गार्ड (वीडीजी) के सदस्यों ने अपनी लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर केंद्र सरकार और संसद का ध्यान खींचा है।
शिवसेना (यूबीटी) के पूर्व विधायक प्रत्याशी तिलक शान ने शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत को लिखे पत्र में कहा कि 1996 में जब उग्रवाद चरम पर था, तब स्थानीय युवाओं को गांवों की रक्षा और सुरक्षा बलों की मदद के लिए हथियार दिए गए थे। कई वीडीसी सदस्यों ने आतंकियों से लड़ते हुए जान गंवाई और कई आर्थिक, सामाजिक व मानसिक कष्ट झेले। बाद में वीडीसी को वीडीजी में बदला गया और आरएस4,000 प्रति माह मानदेय तय किया गया।
तिलक शान के अनुसार, आज के हिसाब से यह लगभग आरएस135 रोजाना बनता है, जो 21वीं सदी में जीवनयापन के लिए नाकाफी है। उन्होंने कहा कि अब शिक्षित और स्नातक युवा भी नए हथियारों के साथ सेवा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें उचित वेतन, नौकरी की सुरक्षा, बीमा या भविष्य की कोई गारंटी नहीं मिल रही। इससे वीडीजी सदस्यों और उनके परिवारों में निराशा है।
वीडीजी सदस्यों की मुख्य मांगों में मासिक मानदेय/वेतन में बढ़ोतरी, उचित कल्याण और पुनर्वास नीति बनाना, बीमा, चिकित्सा और पारिवारिक सहायता लाभ देना व शहीद वीडीसी सदस्यों के परिवारों को विशेष मुआवजा और मदद आदि शामिल हैं।
तिलक शान ने सांसद अरविंद सावंत से अनुरोध किया कि वे इस मुद्दे को संसद में उठाएं और भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से वीडीसी/वीडीजी सदस्यों की मांगों पर गंभीरता से विचार कर कदम उठाएं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इन देशभक्त और अब तक उपेक्षित लोगों की लंबे समय से लंबित अपेक्षाओं को पूरा करेगी।